Friday, July 9, 2010

कृषि की उपेक्षा से झारखंड के युवाओं का पलायन

झारखंड में खेती योग्य भूमि सिकुड़ती जा रही है। इसके मुख्यत दो कारण हैं। पहला कि बड़े औद्योगिक घराने भविष्य की योजनाओं के तहत बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण कर रहे हैं। दूसरा, कृषि योग्य खेत तेजी से बंजर हो रहे हैं।
कृषि और किसान सरकार की प्राथमिकता सूची से लगभग बाहर हैं। यहां के खेतों की हालत देख यह समझा जा सकता है। कई-कई एकड़ जमीन के मालिक भी आजीविका के लिए दूसरे साधनों की तलाश में रहते हैं। झारखंड के किसानों और मजदूरों का बड़ी संख्या में पलायन इसका जीता-जागता उदाहरण है।
राजनीति में उलझी सरकारों ने सोचा ही नहीं कि पठारी क्षेत्रों के लिए अलग कृषि नीति होनी चाहिए। यह सभी जानते हैं कि मैदानों की तुलना में पहाड़ी इलाकों सिंचाई बेहद जटिल हैं। सिंचाई के साधनों की कमी जटिलता कई गुणा बढ़ा देती है। सरकार के तमाम दावों के बावजूद खेती वर्षा पर आधारित है। साल भर के लिए भी अनाज का उत्पादन नहीं हो पाता। ऐसे में एक समान कृषि और विपणन नीति से पठारी क्षेत्रों का भला नहीं होने वाला है।
झारखंड की मात्र 24 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन का एक बड़ा हिस्सा ऊसर है। ऐसे में कृषि को आर्थिकी से जोड़ने के लिए अतिरिक्त प्रयास की जरूरत है। एक बात और। बदलते दौर में युवाओं में कृषि का क्रेज हो, इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास की जरूरत है। यह चुनौती भरा काम है। लेकिन जरूरी है।

No comments: