Sunday, April 5, 2009

बिन पानी सब सून

किशोर कुमार
बाढ़, सूखा और अकाल एक साथ जिस धरती पर हो, वह भारत ही हो सकता है। इसका कारण जलाभाव व अनाज की कमी जितना नहीं, उससे कहीं अधिक कारण कुप्रबंध है। एक बहुत बड़े अर्थशास्त्री सव्यसाची भट्टाचार्य ने सिद्ध भी किया कि भारत में पड़े सबसे बड़े अकाल से पहले वाले साल में यानी 1932-33 में अनाज का उत्पादन अपेक्षाकृत कम हुआ था, पर अकाल नहीं पड़ा। उनका कहना है कि सरकारी तंत्र ने कृत्रिम रूप से वह स्थिति पैदा की थी। जल संकट के संदर्भ में भी यही कहा जा सकता है। भारत में जलसंकट जलाभाव से कम, कुप्रबंधन से अधिक जुड़ा है। गौरतलब है कि आपने भूख से मौत की सूचना या खबर पढ़ी होगी, पर प्यास से मौत की खबर शायद ही पढ़ने को मिली। इसका क्या कहा जाए कि 10 सेमी बारिश वाला इजरायल तो निर्यात के लायक अनाज उपजा लेता है, पर पांच गुना बारिशवाले भारत में अनाज का अकाल बना रहता है। जबकि तथ्य है कि भारत में उपलब्ध कुल पानी का 73 प्रतिशत खेती व सिंचाई में खर्च किया जाता है। यह कितना विचित्र है कि जल को हम जीवन तो मानते हैं, पर जीवन में अपनाए जानेवाले प्रबंधन (मैनेजमेंट) का इस मामले में घोर अभाव होता है।
वैसे तो धरती की करीब सात अरब की आबादी के लिए कुल एक अरब 40 घन किलो लीटर पानी उपलब्ध है, पर इनमें से 97.5 प्रतिशत भाग समुद्री है तथा 1.5 प्रतिशत हिस्सा ध्रुवीय भागों में पड़ता है। शेष एक प्रतिशत पानी ही हमारे काम में आता है। अब सोचिए आप कि एक आदमी के लिए आवश्यक 40 लीटर पानी कैसे उपलब्ध होता होगा। यह अंतर्राष्ट्रीय मानक है। एक व्यक्ति को पीने के लिए प्रतिदिन तीन लीटर तथा जानवरों के लिए 50 लीटर पानी की जरूरत होती है। मुंबई जैसे महानगर में जहां रोज गाड़ियों को धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है और ब्रश करने के दौरान प्रति पांच मिनट 25-30 लीटर पानी बेकार चला जाता है। कैसी विडंबना है कि इससे अलग दूसरी तरफ भारतीय नारियों को पानी के लिए रोजाना कम से कम चार मील पैदल चलना पड़ता है। श्रम, शोषण, गरीबी, कुपोषण का असर है कि कम वजन के बच्चों में 43 प्रतिशत सिर्फ भारत में पैदा होते हैं। सिर्फ भारत में हर साल 15 लाख बच्चे डायिरया से काल कवलित हो जाते हैं। प्रदूषित जलापूर्ति के कारण 3.37 करोड़ लोग जलजन्य बीमारी से ग्रस्त होते हैं। दुनिया में 22 लाख लोग जलजन्य बीमारी से मौत के गाल में समा जाते हैं। अब सोचिए जरा कि आप तक एक लीटर दूध के लिए 700 लीटर, एक किलों गेहूं के लिए 1000 लीटर, एक किलों चावल के लिए 4000 लीटर पानी कहां से आता है। जब 20 प्रतिशत लोगों को ही शुद्ध पेयजल मिलता हो तो यह हाहाकार कैसे नहीं प्रचंड रूप धारण करेगा। पिछले 50 सालों में 67 हत्याकांड सिर्फ पानी के लिए हुए तो यह जानकर अचरज नहीं होना चाहिए।
आइंस्टाइन ने कहा था कि तीसरा विश्वयुद्ध किस हथियार से लड़ा जाएगा नहीं मालूम, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध लाठी और पत्थर से लड़ा जाएगा यह तय है। यहां यह बता दें कि वैज्ञानिकों की आशंका जिस तीसरे विश्वयुद्ध को लेकर है वह पानी को लेकर ही होना है। अभी-अभी 17 मार्च 2009 को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में वैज्ञानिकों के सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर दुनिया भर के राजनेताओं से गंभीर पहल की अपील की गई है। इसमें जलसंकट व प्रदूषण महत्वपूर्ण है।

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