Sunday, April 5, 2009

बोकारो की अनपढ़ महिला ने लिखी कामयाबी की इबारत

हौसले को पंख हों तो हसरत हुनर के पांव चलकर उड़ान भर ही लेता है। आठ बाई दस के दो कमरों के घर में रहनेवाला कुनबा दिहाड़ी और खेती से चल जाता है तो खुदा की नेमत होती है। ऐसे में बोकारो के बांसगोड़ा सिबनडीह की संगीता देवी ने जो भी किया वह कामयाबी की इबारत है।
छह लोगों के जिस कुनबे में दिहाड़ी और खेती ही जीने का आसरा थे, वहां आज अकेली संगीता ही 1200 से 1500 रुपए प्रतिमाह आय कर लेती है। अब उसे उम्मीद है कि गरीबी और संघर्ष से उबर कर वह भी खुशहाल जीवन जी लेगी।
संगीता के पति ठेका मजदूरी करते हैं तो देवर खेती करता है। घर की गाड़ी पति के ही कंधे पर ही थी। ऐसे में संगीता के सामने गुरबत की गाड़ी पर जिंदगी को चलाना बहुत मुश्किल हो रहा था। सभी भारतीय स्त्री की तरह उसकी भी इच्छा होती कि वह पति के संघर्ष को हल्का करे। इसके लिए कुछ करे। संगीता मानती है कि जन शिक्षण संस्थान, बोकारो के प्रशिक्षुओं से मुलाकात के बाद उम्मीद की किरण दिखी। उसने भी केंद्र द्वारा चलाए जा रहे प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की जानकारी ली। संगीता ने भी यहां से प्रशिक्षण ले लिया। चार माह के प्रशिक्षण के बाद वह घर में बैठे-बैठे सिलाई-कढ़ाई कर महीने में 1500 से 1600 रुपए प्रतिमाह की आय हो जाती है।

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