Friday, October 2, 2009

भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क रोटी है

सुनो!
आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूं
जिसके आगे हर सच्चाई छोटी है
इस दुनिया में
भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क
रोटी है।’
ये पंक्तियां हैं हिंदी के मूर्धन्य कवि धूमिल की। भारत की आजादी के छह दशक बाद भी खासतौर से ग्रामीणों की स्थिति पर नजर डालें तो कहना होगा कि धूमिल की ये पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैं। देश में बदलाव की आंधियां आईं-गईं, सरकारें बनीं और उनका पतन भी हुआ। लेकिन रोटी की समस्या बनी रह गई। हम जिस हरित क्रांति की दुहाई देकर देश को प्रगति के पथ पर ले जाना चाहते थे, आज वह हमारी ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था की बर्बादी का कारण बन गई है। अब फिर रासायनिक खेती का आसरा छोड़कर जैविक खेती की ओर रूख करने की मजबूरी है। देश की आजादी के बाद भी हम शिक्षा के मामले में मैकाले की नीतियों का अनुसरण करते रहे। नतीजतन युवा भारत की बड़ी फौज के लिए “हर हाथ को काम” महज सरकारी जुमला बनकर रह गया।
देश में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी तो देश के अशिक्षित युवाओं को हुनरमंद बनाने के मामले में कुछ उम्मीदें जगी थीं। इसलिए कि उसका या उसके महत्वपूर्ण सहयोगी दल भाजपा का चुनावी वायदा होता था - कौशल पुनश्चर्या तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण देने का व्यापक तंत्रजाल स्थापित किया जाएगा। पारम्परिक रूप से या निजी पहल के माध्यम से अर्जित कौशलों के प्रमाणन की व्यवस्था की जाएगी।
यह भी वायदा किया जाता था कि प्रत्येक उस बच्चे को जो ऐसा करने का इच्छुक है, सामान्य व्यावसायिक कौशल प्रदान करने के लिए माध्यमिक स्तर पर अतिरिक्त संरचना तथा सुविधाएं सृजित की जाएंगी। कौशल विकास और व्यावसायिक शिक्षा के प्रति माता-पिताओं और समुदायों के बीच अभिवृत्तिपरक परिवर्तन उद्भूत करने के लिए एक नवीन देशव्यापी पहल शुरू की जाएगी। कुशल मानवशक्ति, जोकि परस्पर लाभकारी होती है, को तैयार करने के लिए उद्योग क्षेत्र से आज की भूमिका से कहीं बड़ी भूमिका निभाने का आग्रह किया जाएगा।
लेकिन ये वायदे कोरे साबित होते रहे। अब राजग केंद्र की सत्ता में तो नहीं है। पर अनेक राज्यों में उसकी सरकारें हैं। लेकिन इन वायदों पर उन राज्यों में भी अमल नहीं किया जा रहा है। इसके उलट पहली बार कांग्रेस अनौपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण के मामले में गंभीर दिख रही है। उसने कौशल विकास को मिशन के तौर पर लिया है और उसके लिए बड़ी धनराशि भी उपलब्ध करवाई है। अब देखना है कि स्थितियां बदलती हैं या फिर धूमिल की पंक्तियां चरितार्थ होती रहेगी।

2 comments:

Mithilesh dubey said...

मुद्दा गंभीर है बन्धु।

Anonymous said...

कौन कहता है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता, तबीयत से एक पत्थर तो उछालो यारो! आप तबीयत से पत्थर उछालते रहिए। हम सब आपके साथ हैं इस उम्मीद के साथ कि हम होंगे कामयाब एक दिन।