सुन्दर फूलों के लिए इनके पौधों को उगाना फूलों की खेती अथवा पुष्पोत्पादन कहलाता है। सामाजिक और धार्मिक मूल्यों के प्रति मानवीय अभिरुचि में परिवर्तन के कारण दिन-ब-दिन फूलों की मांग बढ़ रही है। फूलों का अब भारत में लगभग सभी समारोहों में इस्तेमाल होने लगा है, जिसकी वजह से इनकी घरेलू मांग में तीव्रता से वृदि हो रही है। कट-फ्रलावर की अंतर्राष्ट्रीय मांग, विशेष तौर पर क्रिसमस और वेलेंटाइन डे के दौरान बहुत अधिक बढ़ जाती है।
गुलाब, गेरबेरा, कार्नेशन, क्रिजेन्थेयॅम, आर्किड्स ग्लैडियोलस तथा कुमुदिनी आदि की जबर्दस्त मांग है। पफूल उद्योग की वार्षिक वृदि क्षमता करीब 25 - 30 है। इस तीव्र वृदि का आधार इसकी निर्यात क्षमता है। इसका बाजार बहुत व्यापक है तथा भारतीय कट-फ्रलावर के निर्यात की क्षमता की कोई सीमा नहीं है। भारत एक सामान्य उष्णकटिबंधी देश होने के कारण, यह एक सजावटी पौधें का खजाना है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फूल उत्पादन बाजार व्यापार करीब 125,000 करोड़ रु. रहने का अनुमान लगाया गया है, जिसमें से कट फ्रलावर का हिस्सा करीब 80,000 करोड़ रु. का है। इसमें से, भारत का व्यापार केवल 300 करोड़ का है। अतः अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसका हिस्सा बढ़ाने की अच्छी संभावना है।
फूलों की खेती खुले स्थान में अथवा पॉलीहाउस में की जा सकती है। हालांकि,पॉलीहाउस में की जाने वाली खेती को वरीयता दी जाती है क्योंकि इससे कृत्रिम रूप से नियंत्रण पर्यावरण उपलब्ध् होता है जिसमें रोगों, कीटों, उच्च तापमान, अत्यधिक रोशनी, भारी वर्षा आदि के खतरे न्यूनतम हो जाते हैं अतः फूलों का उत्पादन हर मौसम में पूरे वर्ष किया जाता है। पॉलीहाउसिस में फूलों का उत्पादन दो प्रकार से होता है :-
क. मृदा खेती : पौधे मिट्टी में उगाए जाते हैं।
ख. मिट्टी रहित/हाइड्रोपोनिक कल्चर : पौधें को बगैर मिट्टी के, बर्तनों में उगाया जाता है। बर्तनों में मिट्टी के स्थान पर धूल/रेता, कोको-पिट आदि का प्रयोग किया जाता है। बाहर से पाइप या ड्रिप के जरिए पोषक तत्वों तथा पानी की आपूर्ति की जाती है। हाइड्रोपोनिकली उत्पादित फूलों की गुणवत्ता अच्छी है तथा
बाजार में अधिकतम मूल्य प्राप्त होता है। फूलों की खेती उद्योग को निम्नलिखित व्यक्तियों की आवश्यकता होती है :-
क. कुशल कामगार : मैनुअल कार्य में प्रशिक्षित व्यक्ति, जैसे कि फूलों की कटिंग, कटाई, पैकेजिंग, परिवहन तथा शीतल जगहों पर भण्डारण कार्य में दक्ष।
ख. कनिष्ठ तकनीशियन : 10 वीं पास साथ में फूलों की खेती, हाइड्रोपोनिक/मृदा संस्कृति, पैकेजिंग तथा भण्डारण, पाइपलाइनों के निर्माण तथा अनुरक्षण, स्प्रिंकलर, ड्रिप, शीत भण्डारण आदि तकनीकों में 6 माह से एक वर्ष का प्रशिक्षण।
ग. वरिष्ठ तकनीशियन/पुष्पोत्पादक : इस पद हेतु अनिवार्य योग्यता है कृषि/फूलों की खेती/वनस्पति विज्ञान में बी.एससी. के साथ पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस, ड्रिप सिंचाई तथा फर्टिगेशन, हाइड्रोपॉनिक कल्चर, परिवहन, बिक्री, विपणन तथा निर्यात में विशेषज्ञता होनी चाहिए। कम्प्यूटर का ज्ञान वांछनीय है।
घ. वैज्ञानिक/वैज्ञानिक अधिकारी/प्रबंधकः कृषि/फूल उत्पादन/सूक्ष्मजीवविज्ञान/वाइरोलॉजी के क्षेत्र में एम.एससी./पी. एचडी. के साथ-साथ पॉलीहाउस/ग्रीन हाउस, सिंचाई और फर्टिगेशन, हाइड्रोपॉनिक कल्चर, बिक्री, विपणन तथा निर्यात में विशेषज्ञता होनी चाहिए।
स्वरोजगार के अवसर
इस क्षेत्र में स्वरोजगार की अच्छी संभावनाएं हैं। सीमित संसाधनों के साथ लघु फूल उत्पादन उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं जो कि एक लाभकारी रोजगार हो सकता है। इस उद्योग में बहुत अच्छी रोजगारपरक और विदेशी मुद्रा अर्जित करने की क्षमता है। भारत में फूलों की खेती से संबंधित कुछ उद्योगों की सूची जिनमें रोजगार उपलब्ध् हो सकता है :
पुडुमजी प्लांट लैबोरेटरीज् लिमि. पुणे।
शारदा फार्म्स, नासिक।
साहिल एग्रो एंड फार्म प्रॉडक्ट, 24 - कापसहेड़ा, दिल्ली।
अल-फलाह ब्लॉसम्स लिमिटेड, ए-22,ग्रीन पार्क, अरविंदो मार्ग, नई दिल्ली।
श्रेयस ब्लूम्स, रघु गंज, चावड़ी बाजार,दिल्ली।
(रोजगार समाचार से साभार)
1 comment:
बेहद सूचना परक आलेख किन्तु "अंग्रेजी" वाले फ़ूलों का कारोबार इससे दुगना है....
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