हुनर ने बदल दी जिंदगी की तस्वीर
राजेश कुमार महतो, पिता-
उसरडीह, बिजुलिया
जीविका का स्रोतः इलेक्ट्रीशियन का काम
आय- ढाई से तीन हजार रुपए प्रतिमाह
अब लोगों के बीच वोकेशनल ट्रेनिंग की एडवोकेसी करने लगा है।
हुनर के बिना पढ़ाई उसी तरह बेकार है जैसे आत्मा के बगैर शरीर। हुनर से मुकाम पाकर ही शिक्षा सार्थक होती है। बेकारी और परिवार की जिम्मेवारी से जीवन किस तरह विषाक्त हो जाता है, इसे उसरडीह बिजुलिया मोड़ के राजेश कुमार महतो ने काफी करीब से देखा है। आज जब वह प्रतिमाह 2500 से 3000 रुपए प्रतिमाह की कमाई करने लगा है तो उसे जीवन में हुनर की जरूरत और अहमियत समझ में आ गई है। इस तब्दीली के लिए वह सीसीडी को श्रेय देता है।
उसरडीह बिजुलिया का राजेश कुमार महतो, पिता मोहन महतो के पास थोड़ी-बहुत जमीन है भी तो उससे बस एक ही फसल धान की उपज होती है। मैट्रिक तक की शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद कोई भी छोटा-मोटा रोजगार नहीं था। शादीशुदा होने के कारण दो दर्जन लोगों का संयुक्त परिवार चला पाना मुश्किल था। लचर आर्थिक स्थिति के कारण आगे की पढ़ाई जारी रख पाना बेहद मुश्किल था। किसी कार्य विशेष में दीक्षित न होने के कारण कोई नौकरी भी मुश्किल थी। बेकारी के इसी दौर में उसे व्यावसायिक प्रशिक्षण की जरूरत महसूस हुई। किसी दोस्त से उसे सीसीडी द्वारा तालगड़िया मोड़ में चलाए जा रहे इलेक्ट्रीशियन के प्रशिक्षण की जानकारी मिली। इसी केंद्र से राजेश ने छह माह तक इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में प्रशिक्षण लिया। हुनरमंद होने के बाद खाली हाथ वह एक जगह तलाशने लगा। खाली हाथ होने का अब उसे कोई मलाल नहीं था, क्योंकि अब वह आत्मविश्वास से लबरेज था। इसी आत्मविश्वास के सहारे उसने किराए का एक कमरा सिर्फ इस भरोसे पर ले लिया कि जो आय होगी उससे वह किराया दे देगा।
अब टूल्स हासिल करने की उसकी यात्रा शुरू हुई। किसी तरह उसने इधर-उधर से टूल्स का जुगाड़ कर लिया। धीरे-धीरे काम मिलने लगा। अब तो हाल यह है कि उसकी मासिक आमदनी कम से कम ढाई हजार रुपए प्रतिमाह होने लगी है। अब लोगों के बीच वोकेशनल ट्रेनिंग की एडवोकेसी करने लगा है।
बेकारी से आर्थिक सुदृढ़ता की यात्रा
सोमेन घोषाल, पिता- माधव चंद्र घोषाल
उसरडीह, पंचायत बाटबिनोर प्रखंड चास
जीविका का स्रोत - इलेक्ट्रीशियन का काम
आय-4000-5000 रुपए प्रतिमाह
जब तक हुनर नहीं था, बेकार था। लोगों के ताने सुनने पड़ते थे। जिंदगी में आ गया यू-टर्न।
इंटर तक की पढ़ाई करने के बाद भी हुनरमंद न रहने के कारण सोमेन घोषाल निठल्ला था। घर और बाहर के तानों से आजिज आ गया था। बीसीसीएल से सेवानिवृत्त होने के बाद पिता को पैसा तो काफी मिला, पर सारा पैसा बीमार मां के इलाज में होम हो गए। ऐसे में स्वरोजगार की रही-सही उम्मीद जाती रही। इसी दौरान सीसीडी के बिजुलिया हाई स्कूल में चल रहे प्रशिक्षण केंद्र की जानकारी मिली। यहां से प्रशिक्षित सोमेन आज करीब 4000-5000 रुपए प्रतिमाह की आमदनी कर लेता है। जीवन में आए इस टर्निंग प्वाइंट के बाद वह अब सीसीडी का प्रचारक-सा हो गया है।
ग्राम उसरडीह, पंचायत बाटबिनोर प्रखंड चास के सोमेन घोषाल, पिता-माधव चंद्र घोषाल ने धनबाद के भौंरा हाईस्कूल से मैट्रिक तक की शिक्षा ग्रहण कर पटना के जेके कालेज से इंटर की शिक्षा ली। पिता बीसीसीएल में माइनिंग सरदार थे, पर सेवानिवृत्ति में मिले पैसे से कुछ न हो सका। मां किसी सांघातिक रोग से ग्रस्त थी। सभी पैसा उसी में खर्च हो गया। विवाहित हो जाने के बाद पहले से लचर हो गए घर का चलना और भी मुश्किल हो गया। एकमात्र आधार सेवानिवृत्त पिता का पेंशन था। ऐसे में सोमेन का पूरी तरह निठल्ला रहना लोगों को खलने लगा। ताना और छींटाकशी के बीच एक निवाला भी भारी होता जा रहा था। इसी दौरान सीसीडी के सदस्य तथा उसरडीह के लोगों से व्यावसायिक प्रशिक्षण की जानकारी मिली। व्यावसायिक प्रशिक्षण की अहमियत और जरूरत को समझते हुए सोमेन ने भी बिजुलिया केंद्र से इलेक्ट्रिक ट्रेड में प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षित होने के बाद उसने घर से कुछ पैसे लगाकर लाईट डेकोरेशन के उपकरण खरीद लिए। सोमेन की मानें तो अब वह प्रतिमाह कम से कम चार से पांच हजार रुपए प्रतिमाह की आमदनी कर लेता है। अब वह कहता है, जब तक हुनर नहीं था, बेकार था। लोगों के ताने सुनने पड़ते थे। अपनी जिंदगी में आए इस यू-टर्न के लिए सोमेन सीसीडी का शुक्रगुजार है।
हुनर से जिंदगी में आ गई रौनक
अजय कर्मकार, पिता छुट्टू कर्मकार
ग्राम कर्मागड़ा,
जीविका का स्रोत- वेल्डर का काम
आय-2500 से 3000 रुपए
यह आमदनी उसे किसी के रहम से नहीं, अपने हुनर से होती है। इसलिए उसका भी हौसला बुलंद रहता है।
तितलियों के पीछे भागने की उम्र में बच्चे जब हथौड़ा या रिंच पकड़ लेते हों या मेहनत-मजदूरी करने लगते हों तो निश्चय ही यह किसी भी अभिभावक के लिए दिल दहला देनेवाली स्थिति होती है। समाज के लिए भी यह शोभा का विषय़ नहीं। अजय कर्मकार के लिए नौ लोगों के अपने परिवार का भरण-पोषण करना आसान नहीं था। उसके घर के बच्चों को भी मजदूरी करनी पड़ती थी। स्वाभाविक है कि घर के बच्चों को शिक्षा दे पाना मुमकिन नहीं था। आज किसीके सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं है। इस स्थिति को पाने के लिए उसे घर के बच्चों को काम पर नहीं लगाना पड़ रहा। सारा बदलाव आया वेल्डर का काम सीखने के बाद।
आत्मसम्मान व स्वावलंबनपूर्ण जीवन की लालसा भी कहीं न कहीं दबी हुई थी। स्थितियों का संयोग नहीं बन पाने के कारण अजय कर्मकार, पिता छुट्टू कर्मकार, ग्राम कर्मागड़ा हमेशा ही अवसरों से वंचित रहा। लेकिन गोपाल कर्मकार से मुलाकात ने जैसे उसके जीवन को खुशहाली की पटरी पर ला दी। दरअसल गोपाल सीसीडी का अनुदेशक था। वह सीसीडी के बिजुलिया मोड़ स्थित केंद्र में वेल्डिंग का प्रशिक्षण दे रहा था। हैरान-परेशान अजय को गोपाल ने अपने केंद्र पर आकर प्रशिक्षण लेने की प्रेरणा दी। उसे तो कहीं से भी हुनर का इल्म हासिल करना था। सो डूबते को तिनके के सहारे की तरह यही प्रेरणा उसके अंधकारपूर्ण जीवन में किरण लेकर आई। केंद्र के दूसरे सहयोगी तथा अनुदेशक का कहना है कि अजय ने बहुत ही लगन और ईमानदारी के साथ वेल्डिंग का हुनर हासिल किया। फिर क्या था, अंधे को लाठी मिली और सफर पर कदम बढ़ चले। आज वह ग्रील-गेट की दुकान में कार्यरत है। इस धंधे में प्रतिमाह उसे 2500 से 3000 रुपए तक की मासिक आमदनी हो जाती है। यह आमदनी उसे किसी के रहम से नहीं, अपने हुनर से होती है। इसलिए उसका भी हौसला बुलंद रहता है। यह सिर्फ अजय की कामयाबी नहीं। अजय का स्वावलंबन सीसीडी की कार्यसिद्धि है। अजय खुश हैं। उसके जीवन में हुनर से रौनक आई।
सड़क से गैरेज तक का सफर
राजकुमार उरांव, पिता- गुरुपद उरांव,
ग्राम-भौंरा, धनबाद
जीविका का स्रोत-आटो गैरेज मिस्त्री
आय-3000 से 4000 रुपए प्रतिमाह
यह उसकी ही लगन का नतीजा है कि आज भौंरा (धनबाद) में वह एक माहिर मिस्त्री के रूप में जाना जाता है। हाल यह है कि आज उसे काम से फुरसत नहीं मिलती।
सर से पिता का साया उठना उसके लिए वज्रपात से कम नहीं, जिसके सहारा का कोई विकल्प न हो। यही कारण था कि राजकुमार उरांव अपने पिता की मृत्यु के बाद लगभग भिखमंगे की स्थिति में आ गया था। हर रास्ता बंद गुफा की तरह था। पिता की मृत्यु के बाद मां, दो बहनें तथा दो छोटे भाइयों की जिम्मेवारी उसीके कंधे पर आ गई थी। लेकिन रास्ता तो किसी भी तरह निकलना ही था। ऐसे ही दौर में इत्तिफाकन उसकी मुलाकात एक ऐसे सज्जन से हुई जिसका संबंध वोकेशनल ट्रेनिंग से था। ये सज्जन दीपक कुमार चक्रवर्ती थे और सीसीडी के अनुदेशक थे। राजकुमार को क्या पता कि वोकेशनल ट्रेनिंग किस चिड़िया का नाम है और इसकी उड़ान कहां तक है। उसने तो प्यासे की तरह सीधे पानी की मांग की। उसे क्या पता कि पानी पिला देने से एक दिन की प्यास तो बुझ जाएगी, पर हमेशा के लिए कुआं या तालाब खोद लिया जाए तो क्या बात। अनुदेशक दीपक भी इसी इल्म के साथ उसके घनघोर अंधेरे आंगन में टिमटिमाते जुगनू की तरह उतरे।
दरअसल राजकुमार को पता नहीं था कि बगैर पढ़े-लिखे भी ट्रेनिंग ली जा सकती है। दीपक द्वारा यह जानकारी मिली तो जैसे उसकी लाटरी निकल गई। लेशमात्र के शुल्क पर उसका दाखिला आटोमोबाईल ट्रेड में हो गया। दीपक की मदद से वह इस हुनर में दीक्षित भी हो गया। यह उसकी ही लगन का नतीजा है कि आज भौंरा (धनबाद) में वह एक माहिर मिस्त्री के रूप में जाना जाता है। हाल यह है कि आज उसे काम से फुरसत नहीं मिलती। प्रतिमाह उसकी आय तीन से चार हजार रुपए प्रतिमाह तक हो जाती है। अब उसका परिवार भी खुश है। सीसीडी को राजकुमार की कामयाबी पर नाज है।
ईमानदारी और लगन की संगति और हुनर का बल
शंकर प्रसाद, पिता-नंदलाल महतो
ग्राम- गोपालपुर
जीविका का स्रोत-पोल्ट्री फार्म
आय- चार से पांच हजार रुपए प्रतिमाह
इस उधार की पूंजी से उसने बहुत ही छोटे पैमाने पर पोल्ट्री फार्म का व्यवसाय शुरू किया। अब प्रतिमाह उसे चार से पांच हजार रुपए तक की प्रतिमाह आय हो जाती है।
गरीबी रेखा के नीचे रहनेवालों को बैठे-बिठाए सुविधा मिल जाती है। ऐसे लोगों को लगता है कि गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवार में जन्म लेना काफी है। शंकर प्रसाद महतो भी इसी तरह के विचार वाले लोगों में था। लेकिन असलियत तो व्यावहारिक जिंदगी की जद्दोजहद से दो-चार होने के बाद समझ में आई। शंकर प्रसाद महतो, पिता- नंदलाल महतो, ग्राम गोपालपुर बिजुलिया हाई स्कूल में मनाए जा रहे राष्ट्रीय युवा दिवस कार्यक्रम में शामिल था। उसे इसी दिन जानकारी मिली कि रोजगार की तलाश में यूं भटकने की जरूरत क्या। इतने बड़े देश में जहां संसाधनों की कमी नहीं, शिक्षित बेरोजगारों की फौज निरंतर बढ़ती जा रही है। ऐसे में रोजगार के लिए पढ़-लिख लेना काफी नहीं। उसे लगा कि किसी न किसी रोजगारमूलक शिक्षा में प्रशिक्षण हासिल करना जरूरी है। उसे जानकारी मिली कि सीसीडी तो बिजुलिया मोड़ में पोल्ट्री का प्रशिक्षण केंद्र चला रहा है। कहीं दूर जाने की जरूरत भी नहीं थी। यह तो लगभग घर में आकर प्रशिक्षण देने जैसा था। बहुत ही लगन से उसने पोल्ट्री फार्म का प्रशिक्षण लिया। हुनर का इल्म लोगों को किस तरह आत्मविश्वास से भर देता है शंकर इसका ज्वलंत उदाहरण है। हुनर पर भरोसा तथा ईमानदारी की बदौलत दोस्तों से वह कर्ज लेने में कामयाब रहा। इस उधार की पूंजी से उसने बहुत ही छोटे पैमाने पर पोल्ट्री फार्म का व्यवसाय शुरू किया। अब प्रतिमाह उसे चार से पांच हजार रुपए तक की प्रतिमाह आय हो जाती है। आज वह न सिर्फ दोस्तों का कर्ज लौटा चुका है, बल्कि 16 सदस्यों का उसका घर चहक रहा है।
कर्मठ कमलाकांत को मिला हुनर से मुकाम
कमलाकांत खवास, पिता- सुशील खवास
चास
जीविका का स्रोत-फीटर का काम
आय-200-250 रुपए प्रतिदिन
कुल नौ लोगों के कुनबे में काम करनेवाला सिर्फ एक। सोचा जा सकता है कि परिवार का संचालन कैसे होता होगा। पिता के अवकाशप्राप्त करने के बाद बेटी की शादी तथा मकान बनाने में सारा पैसा खत्म हो गया। शेष रकम अपने बचे जीवन के निर्वाह के लिए उन्होंने रख लिया। स्वाभाविक है कि जीविका की चिंता में सभी चारों भाई परेशान थे। ऐसे ही परेशानियों भरे दौर में एक दिन चास में नशामुक्ति दिवस के आयोजन पर कमलाकान्त खवास को सीसीडी के प्रशिक्षण केंद्र के संबंध में जानकारी मिली। जानकारी मिली कि बेकार युवकों को रोजगारोन्मुखी शिक्षण-प्रशिक्षण देकर हुनरमंद किया जाता है। इसके बाद उसने भी फीटर का प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षित होने के बाद कुछ दिन तो वह घरों में जाकर काम लेता रहा। फिर कौशल और ईमानदारी की बदौलत उसने अपने क्षेत्र में अच्छा नाम बना लिया। इसके बाद बियाडा के एक वर्कशाप में काम मिल गया। आज मेहनत और हुनर की बदौलत उसका और उसके परिवार का जीवन खुशहाल है। अपनी आर्थिक उन्नति के लिए वह पूरी तरह सीसीडी का अहसानमंद है।
हुनर ने दिया रोजगार और दूसरे को रास्ता
बैजनाथ महतो, पिता ठाकुरदास महतो
ग्राम-संतालडीह
जीविका का स्रोत- मशरूम की खेती
आय- चार हजार रुपए
उसके संघर्ष के आलोक में दूसरे अपनी राह तलाशेंगे, यह सोचना तो और भी अजूबा था उसके लिए।
बोकारो के चास प्रखंड की भुंड्रो पंचायत के तेलीडीह केंद्र में मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लेनेवाला बैजनाथ ने कभी यह सोचा भी नहीं होगा कि इस हुनर में पेशा करते हुए उसकी दशा इतनी सुधर जाएगी कि वह दूसरों के लिए प्रेरक बन जाएगा। उसके संघर्ष के आलोक में दूसरे अपनी राह तलाशेंगे, यह सोचना तो और भी अजूबा था उसके लिए। चास प्रखंड की संतालडीह पंचायत में रहनेवाले बैजनाथ महतो, पिता ठाकुरदास महतो के संयुक्त परिवार में कुल 18 सदस्य थे। जीविका का एकमात्र स्रोत कृषि होने के कारण आय सीमित थी। आठवीं पास बैजनाथ के लिए परिवार चलाना मुश्किल था। अखबार में व्यावसायिक प्रशिक्षण की खबर देखने के बाद उसमें इसे जानने की ललक थी। अवगत होने के बाद बैजनाथ ने भी मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद तो उसने भी मशरूम की खेती शुरू कर दी। उसके मशरूम की सप्लाई बड़े पैमाने पर चास बाजार में है। पहले जहां पूरे परिवार की आय दो हजार रुपए थी, वहीं मशरूम की खेती के बाद उसकी आय में दोगुना बढ़ोतरी हो गई। अब मशरूम की खेती के समय उसके परिवार की आय चार हजार हो गई। हुनर से मिली उन्नति के साथ बैजनाथ की संघर्ष यात्रा को विराम नहीं लग गया। उसके कौशल को देखकर सीसीडी ने जन शिक्षण संस्थान बोकारो के साथ मिलकर उसे उसके ही गांव संतालडीह में एक व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र चलाने की अनुमति दे दी। उसके हुनर और कौशल का ही कमाल है कि आज इस गांव के काशीनाथ सिंह, नीलकंठ गोप, राजकुमार झा, सुनील कुमार महतो, परीक्षित महतो तथा नमीता देवी उसकी राह पर चलकर आज मशरूम की खेती करने लगे हैं। सभी की आय के स्रोत में इजाफा हो गया।
No comments:
Post a Comment