सरकारी तंत्र तो सामाजिक विकास के लिए कई स्तर से पहले से ही सक्रिय है, लेकिन इसके लिए स्वैच्छिक संस्थाओं में पारस्परिक तालमेल की जरूरत है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम स्थानीय जरूरत और उपलब्धता को भी ध्यान में रखें। यह सारी बात ग्रामीणों को भाषण से नहीं समझाया जा सकता है। वे भाषण पर नहीं, व्यवहार पर विश्वास करते हैं।
यह कहना है नाबार्ड के डीडीएम एमके मंडल का। श्री मंडल जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस) बोकारो द्वारा आयोजित सामाजिक विकास में स्वैच्छिक संस्थाओं व लघु उद्यमिता की भूमिका पर संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
श्री मंडल ने अपने संबोधन में बोकारो में लघु उद्यमिता की संभावनाओं पर सविस्तार प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अलग-अलग काम करने के बजाए, एक ही जगह कुछ काम किया जाए ताकि ग्रामीणों के बीच एक माडल पेश किया जा सके। उन्हें बताने में सुविधा होगी। जिस गांव को गांधीजी भारत की आत्मा कहते थे, उन गावों के आर्थिक सुधार के लिए वहां की प्रतिभा, मानव संसाधन को उन्नत करना होगा। ग्रामीण विकास के लिए कच्ची सामग्री, कौशल और कोष के साथ मार्केट सपोर्ट की भी जरूरत है। ऊन्होंने कहा कि यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक कि सामाजिक कार्य दूरगामी सोच के साथ न किए जाएं।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता राज्य खादी बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार मधुकर ने कहा कि भारतीय समाज के विकास में पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण संवादहीनता है। सरकार के स्वरूप से लेकर उसकी कार्यप्रणाली तक में यह व्याप्त है। जन प्रतिनिधियों की जनता से दूरी बढ़ने के कारण ऐसा हुआ। लेकिन स्वैच्छिक संस्थाएं जनता के बीच रहकर यह काम करती हैं, इसलिए स्वैच्छिक संस्थाएं इस संवादहीनता को दूर कर सकती हैं। विकास के अमरीकी माडल को तो सारी दुनिया ने नकार दिया है। मंदी उसी का नतीजा है।
उन्होंने कहा कि भारत में मंदी का कहीं कोई संकेत नहीं है। कोई बताए कि कौन बैंक घाटे में गया और किस फैक्ट्री का उत्पादन गिर गया। दरअसल मंदी के बहाने कंपनियां अपना पाप धो रही हैं। लेकिन यह भी सही है कि विकास में भारत लगातार पिछड़ रहा है। रोजगार का संकट है, उद्यमिता का संकट है। इसके लिए समाज से, जन से संवाद कायम करना होगा। संकटों से निपटने के लिए लघु उद्यमिता में असीम संभावनाएं हैं वहां। उनसे संवाद कायम करने की जरूरत है।
श्री मधुकर ने कहा कि कृषि में उद्यमिता की असीम संभावनाएं हैं। यहां के कृषक के पास उन्नत परंपरागत तकनीक का ज्ञान है, भले ही उसने कृषिविज्ञान की पढ़ाई नहीं की। कृषि आधारित उद्यमिता पर विचार करते समय अलग-अलग तरीके और कौशल पर विचार करना भूल होगी। इससे संकट और गहराएगा। दरअसल कृषि एक चक्र है। इस चक्र में बेकार तो पशु के लिए होता है और उत्तम मनुष्य के लिए होता है। लेकिन स्वैच्छिक संस्थाएं चाहें तो वेस्ट को बेस्ट में बदल सकती हैं।
इसी मौके पर प्रदान के टीम लीडर रवींद्रनाथ ने कहा कि अब एनजीओ की अवधारणा बदल रही है। आज के दौर में पुराने समय के कुशल लोग अपडेट नहीं हैं। इस कारण वे ग्रामीण परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक नहीं रहे। उनका काम प्रशासनिक अधिक रहा। स्वैच्छिक संस्थाएं सेतु का काम कर सकती हैं। गांवों में गरीब, दीन-हीन लोगों के बीच विकास का काम करना है। उनका जीवन स्तर उठाना है। ऐसे में इस तबके के लिए खाद्य सुरक्षा व आय सृजन पर विचार करना होगा। अन्यथा विकास की प्रक्रिया में उन्हें शामिल नहीं किया जा सकता है। भूखे रखकर उन्हें ट्रेनिंग नहीं दी सकती है। उनके बीच रहकर काम करने की जरूरत है। अन्यथा किए गए काम को आगे जारी नहीं रखा जा सकता है। संरचना की रक्षा और निरंतरता के लिए यह जरूरी है। कार्यक्रम दौरान वरिष्ठ पत्रकार मधुकर जी से सवाल-जवाब का सत्र भी चला। नाबार्ड के डीडीएम एमके मंडल की प्रोन्नति पर लोगों ने बधाई भी दी।
जेएसएस बोकारो के चेयरमैन किशोर कुमार ने सामाजिक बेहतरी के लिए सक्रिय परिवर्तनकामी शक्तियों के समन्वय के लिए जेएसएस बोकारो को संकल्पवान बताया। उन्होंने अनौपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए जेएसएस बोकारो के लगातार जारी अभियान पर प्रकाश डाला व अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया।
उक्त कार्यक्रम में सोसाईटी फार एजुकेशनल डेवलपमेंट एंड इनवायरमेंट मैनेजमेंट (सीडेम) दिल्ली के प्रतिनिधि मनीष कुमार व सुमन कुमार सिंह, सेंटर फार कम्युनिटी डेवलपमेंट (सीसीडी) के सचिव डा. अभिषेक कुमार, रांची के पत्रकार अरविंद कुमार, सामाजिक संस्था आईना के प्रमुख हरेंद्र कुमार वर्मा, रूपायनी के प्रमुख सीए कुमार, अनमोल दृष्टि के तारकेश्वर, विकास कुमार, भूपेंद्र उपाध्याय, जीवाधन महतो, उषा राय, राधा कुमारी, इंदु सिंह, ममता सुधाश्री समेत दर्जनाधिक सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे।
संगोष्ठी का संचालन संस्थान के प्रभारी निदेशक यूएल दास ने किया।
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